शनिवार, दिसंबर 19, 2009

दिल टूटने का जैसे दस्तूर होगया है

दिल टूटने का जैसे दस्तूर हो गया है
बरबादियों का किस्सा मशहूर हो गया है


अब जाके साहिलों का मैं दर्द जान पाया
कोई करीब आकर फिर दूर हो गया है


कैसे निजात पाऊँ मैं दर्दोरंजोग़मसे ?
मेरा रकीब उनका सिंदूर हो गया है


कोई गवाह होता दिल टूटने का, या रब
इल्ज़ामेबेवफाई मंजूर हो गया है


जब कोई शै जलेगी, होगा तभी उजाला
शायद इसीलिये दिल मजबूर हो गया है

सोमवार, दिसंबर 14, 2009

पँखडी को चूमकर शबनम हवामें खो गयी

पँखडी को चूमकर शबनम हवामें खो गयी
लाजसे चटकी कली, खिलकर जवाँ फिर हो गयी


गेसुओं की छाँवमें या हिज्रमें रातें कटी
दूर दोनो सूरतोमें नींद तो कोसो गयी


फिक्र गर होती हमारी, रुक न जाती वह ज़रा ?
करवटें बदला किये हम, रात आयी सो गयी


आपसे तो नर्मदिल हैं आसमाँकी बदलियाँ
आग जब दिलमें लगी तो चार आँसूँ रो गयी


आसुओंसे गुलशनेदिल जब पड हैं सिंचना
तब पता हमको चला वह बीज कैसे बो गयी


क्या उन्हें एहसास हैं हम जी रहें हैं किस तरह ?
वह हमें लंबी उमर की बददुवा दे तो गयी

मंगलवार, दिसंबर 08, 2009

बेरुखी यह आपकी होगी गवारा कब तलक ?

बेरुखी यह आपकी होगी गवारा कब तलक ?

हुस्न करता इश्कसे, देखें, किनारा कब तलक



हमनवा बन जाइएगा, झूमने मेहफ़िल लगे

मैं बजाऊँ साजेदिलका एकतारा कब तलक ?



दो हिमाला का पता या फिर पता दो यार का

दरबदर फिरता रहूँगा बेसाहारा कब तलक ?



छुप न पाये चाँद-तारें शाम के होते जवाँ

इस जहाँसे तुम छुपाओगी नजारा कब तलक ?



आ, 'भँवर', उनको सुनाए हालेदिल मिलकर गले

धडकने खुदकी सुनेगा दिल हमारा कब तलक ?

सोमवार, नवंबर 30, 2009

रातभर जल रहा था परवाना

रातभर जल रहा था परवाना
क्यों न उजलेगी मेहफ़िलेजाना ?

चँद घडियाँ हैं दिल लगाने की
उम्रभरका है दिल को समझाना

इश्क़ शामिल है क्या गुनाहोंमें ?
क्यों कफ़स़ जैसा है सनमखाना ?

आँख तो नम है इक ज़मानेसे
बात कल की है, आपने जाना

सूख जाये ना प्यासमें आँखें
ग़मसे भर देना एक पैमाना

यह न पूछों की राहमें क्या है
फूल दिलका है, रौंदकर जाना

घर गरीबोंके रोशनी कैसी ?
आगमें लिपटा हो न काशाना
 
तलखियाँ घूँट घूँट देती है
ज़िंदगी है अजीब मैखाना

मंगलवार, नवंबर 24, 2009

क्या हुआ गर आँख उसकी नम नहीं ?

क्या हुआ गर आँख उसकी नम नहीं ?

यह पुरानी याद का मौसम नहीं


दूर तक हो फूल नज़रेयारमें

क्या हुआ गर गुलशनोमें हम नहीं ?


उन लबों पर वस्ल की हो सुर्खियाँ

आशिकोंकी मौत का मातम नहीं


दर्द उतना दो जिसे मैं सह सकूँ

आदमी हूँ; देवता, बरहम नहीं


और तोहफ़ा क्या उसे मैं दूँ, 'भँवर' ?

यार का सहरा लिखा यह कम नहीं

सोमवार, नवंबर 16, 2009

तुम न आये, न कासिदो-खत तक

तुम न आये, न कासिदो-खत तक
दिल तडपता रहा कयामत तक

ज़ुल्म चुपचाप क्यों सहें हमने ?
अब तो मुमकिन नहीं शिकायत तक

अज़लसे हुस्नका अलम दिलपर
कर चुके दिलजलें बगावत तक

ज़ुल्म का दौर है अभी जारी
बात पहुँची कहाँ इनायत तक ?

साथ देना, चलो, नहीं मुमकिन
आप करते नहीं हिमायत तक

फिर तुम्हारा खयाल आया है
फिर हमें ले चले न गुरबत तक

इश्कमें क्या नहीं, 'भँवर', छोडा
शर्म क्या, छोड दी शराफत तक

बुधवार, नवंबर 11, 2009

शिकस्ता साज़ पर गाने लगी है

शिकस्ता साज़ पर गाने लगी है
वह दिल के तार सहलाने लगी है


शबिस्ताँमें कहीं गुलशन खिला या
हवाको साँस महकाने लगी है?


जो कल तक डस रही थी नागिनोंसी
परेशाँ ज़ुल्फ़ सिरहाने लगी है


जलेंगे दिल, तभी होगा उजाला
मुहब्बत की घटा छाने लगी है


किये होंगे हज़ारों कत्ल उसने
तभी तस्वीर हर थाने लगी है


नही जाती कभी तनहा बहारें
जवानी साथमें जाने लगी है


’भँवर’, तलवार तो तलवार, तेरी
कलमही कहर बरपाने लगी है