वही शाम होगी, वही रात होगी
वही अजनबीसी मुलाकात होगी
अभी स्वप्नभी मैं नहीं देख पाया
अभी जागनेकी पुन: बात होगी
घडी दो घडी का मिलन है जुदाई
मिलें उम्रभर तो अलग बात होगी
समझमें न आए कि पूछू, न पूछू
जनाज़ा उठेगा कि बारात होगी
अमानत समझकर न लौटाइयेगा
'भँवर' दिल दिया है तो सौगात होगी
गुरुवार, नवंबर 05, 2009
शुक्रवार, अक्टूबर 23, 2009
बढी बात जब बातही बातमें
बढी बात जब बातही बातमें
हसीं शाम ढलने लगी रातमें
न पर्दा उठाओ, कसम है तुम्हे
मिले ना जुनूँ और जज़्बातमें
तमन्ना जवाँ क्यों न होने लगे ?
झुकाये नज़र वह मुलाकातमें
कहीं फूल का बस बहाना न हो
कहीं दिल दिया हो न सौगातमें
समझ लो है आतिश मुहब्बतजनी
अगरचे लगे आग बरसातमें
अगर जीत लो तुम, मुझे है खुशी
तुम्हे क्या मिलेगा मेरी मातमें ?
'भँवर', ख्व्वाब गुलज़ार होने लगे
उन्हें बो लिया है खयालातमें
हसीं शाम ढलने लगी रातमें
न पर्दा उठाओ, कसम है तुम्हे
मिले ना जुनूँ और जज़्बातमें
तमन्ना जवाँ क्यों न होने लगे ?
झुकाये नज़र वह मुलाकातमें
कहीं फूल का बस बहाना न हो
कहीं दिल दिया हो न सौगातमें
समझ लो है आतिश मुहब्बतजनी
अगरचे लगे आग बरसातमें
अगर जीत लो तुम, मुझे है खुशी
तुम्हे क्या मिलेगा मेरी मातमें ?
'भँवर', ख्व्वाब गुलज़ार होने लगे
उन्हें बो लिया है खयालातमें
शनिवार, अक्टूबर 17, 2009
आयें हैं सो कुछ दिन गुजार जाते हैं
आयें हैं सो कुछ दिन गुजार जाते हैं
लेकर ना जब तक के कहार जाते हैं
क्या शानोशौकत पर गुमान करते हो
दुनियासे मुफ़लिस ताजदार जाते हैं
ना रास्ता अनजाना, न राह मुष्किल है
हर दिन इस दुनियासे हजार जाते हैं
जानकरभी के याँ बार बार आना है
जानेवालें क्यों बेकरार जाते हैं ?
रंजोगम का होने शिकार जाते हैं
करने जब उनका इंतजार जाते हैं
जाने किसकी सुनकर पुकार जाते हैं
मैखाने कुछ, तो कुछ मज़ार जाते हैं
उनके दिलका कब्ज़ा मिले न गैरों को
लो, हम दफ़्तरेतहसीलदार जाते हैं
मंदिर-मस्जिद की धूल की कसम, 'भँवर'
मैखानेभी जूते उतार जाते हैं
लेकर ना जब तक के कहार जाते हैं
क्या शानोशौकत पर गुमान करते हो
दुनियासे मुफ़लिस ताजदार जाते हैं
ना रास्ता अनजाना, न राह मुष्किल है
हर दिन इस दुनियासे हजार जाते हैं
जानकरभी के याँ बार बार आना है
जानेवालें क्यों बेकरार जाते हैं ?
रंजोगम का होने शिकार जाते हैं
करने जब उनका इंतजार जाते हैं
जाने किसकी सुनकर पुकार जाते हैं
मैखाने कुछ, तो कुछ मज़ार जाते हैं
उनके दिलका कब्ज़ा मिले न गैरों को
लो, हम दफ़्तरेतहसीलदार जाते हैं
मंदिर-मस्जिद की धूल की कसम, 'भँवर'
मैखानेभी जूते उतार जाते हैं
बुधवार, सितंबर 09, 2009
प्यास बुझा लें, फिर कर लेंगें धरम-करम की बातें
प्यास बुझा लें, फिर कर लेंगें धरम-करम की बातें
जाम ज़रा छलकाकर कर लें, आ, ज़मज़म की बातें
देख ज़रा, सजधजकर दुनिया फैल रही है बाहें
खूब गले मिल ले उससे तू, छोड अदम की बातें
कल तक हमसे आँख मिलाकर छेड रहा था कोई
आज अचानक क्यों परदा, क्यों लाज-शरम की बातें ?
मूँद ज़रा ली आँख किसीने, प्यार समझ बैठा मैं
आँख खुली तो जान गया, हैं सिर्फ़ वहम की बातें
ग़ालिबसा उस्ताद मिले तो शायर मैं बन जाऊँ
मेहफ़िलमें होंगी तब मेरे नक्षेकदम कीबातें
इक दिन तो जी भरकर पी लूँ सुर्ख लबों के प्यालें
क्यों करते हो रोज़ ’भँवर’से , वाइज़, कम की बातें ?
जाम ज़रा छलकाकर कर लें, आ, ज़मज़म की बातें
देख ज़रा, सजधजकर दुनिया फैल रही है बाहें
खूब गले मिल ले उससे तू, छोड अदम की बातें
कल तक हमसे आँख मिलाकर छेड रहा था कोई
आज अचानक क्यों परदा, क्यों लाज-शरम की बातें ?
मूँद ज़रा ली आँख किसीने, प्यार समझ बैठा मैं
आँख खुली तो जान गया, हैं सिर्फ़ वहम की बातें
ग़ालिबसा उस्ताद मिले तो शायर मैं बन जाऊँ
मेहफ़िलमें होंगी तब मेरे नक्षेकदम कीबातें
इक दिन तो जी भरकर पी लूँ सुर्ख लबों के प्यालें
क्यों करते हो रोज़ ’भँवर’से , वाइज़, कम की बातें ?
रविवार, अगस्त 23, 2009
क्या बताऊँ किस तरह यह ज़िंदगी जाती रही
क्या बताऊँ किस तरह यह ज़िंदगी जाती रही
हर सुबह के बाद अक्सर शामेगम आती रही
खेलकर दिलसे हमारे दिल वह बहलाती रही
जब भरा दिल, तोडकर दिल, दोस्त कहलाती रही
"धूप है तेरा मुकद्दर, प्यार शबनमसे न कर"
गुल न माना बात, बगिया लाख़ समझाती रही’
यूँ किसीने लत लगाई दर्द दे-देकर हमें
ग़मज़दोंको लज़्ज़तेगम उम्रभर भाती रही
वस्ल की बातें न पूछो, वह कहीं शरमा न दें
सिर्फ़ इतना कह सकूँगा, रात मदमाती रही
मैं ज़ुबाँपर नामेका़तिल ला नहीं सकता मगर
जानता हूँ चिल्मनों को कौन सरकाती रही
इश्क़्में खानाखराबी इस कदर दिल की हुई
दिलबरों के वासते अब सिर्फ़ बरसाती रही
था कभी जामेसुख़न तेरी सुराहीमें ’भँवर’
मैकशी का दौर था जब तक कलम गाती रही
हर सुबह के बाद अक्सर शामेगम आती रही
खेलकर दिलसे हमारे दिल वह बहलाती रही
जब भरा दिल, तोडकर दिल, दोस्त कहलाती रही
"धूप है तेरा मुकद्दर, प्यार शबनमसे न कर"
गुल न माना बात, बगिया लाख़ समझाती रही’
यूँ किसीने लत लगाई दर्द दे-देकर हमें
ग़मज़दोंको लज़्ज़तेगम उम्रभर भाती रही
वस्ल की बातें न पूछो, वह कहीं शरमा न दें
सिर्फ़ इतना कह सकूँगा, रात मदमाती रही
मैं ज़ुबाँपर नामेका़तिल ला नहीं सकता मगर
जानता हूँ चिल्मनों को कौन सरकाती रही
इश्क़्में खानाखराबी इस कदर दिल की हुई
दिलबरों के वासते अब सिर्फ़ बरसाती रही
था कभी जामेसुख़न तेरी सुराहीमें ’भँवर’
मैकशी का दौर था जब तक कलम गाती रही
बुधवार, अगस्त 19, 2009
चूमना चाहा तुम्हें, ज़ुल्म यह संगीन है
चूमना चाहा तुम्हें, ज़ुल्म यह संगीन है
चूमनेसे गर रहा, हुस्न की तौहीन है
नेकनामी का चलन क्यों सिखाया, वाइज़ों ?
दागदारों की यहाँ ज़िंदगी रंगीन है
लो, मुकम्मल हो गयी कत्ल़ की तैयारियाँ
है भरोसा, प्यार है; साँप है, आस्तीन है
अल्विदा, ऐ रहबरों; शुक्रिया, ऐ रहगुज़र
मंज़िलों का ग़म नहीं, दौर की तस्कीन है
फूलसे अल्फ़ाज़से जब शहद लेगा ’भँवर’
सुर्ख़ होटों पर सजे, तब गज़ल शीरीन है
चूमनेसे गर रहा, हुस्न की तौहीन है
नेकनामी का चलन क्यों सिखाया, वाइज़ों ?
दागदारों की यहाँ ज़िंदगी रंगीन है
लो, मुकम्मल हो गयी कत्ल़ की तैयारियाँ
है भरोसा, प्यार है; साँप है, आस्तीन है
अल्विदा, ऐ रहबरों; शुक्रिया, ऐ रहगुज़र
मंज़िलों का ग़म नहीं, दौर की तस्कीन है
फूलसे अल्फ़ाज़से जब शहद लेगा ’भँवर’
सुर्ख़ होटों पर सजे, तब गज़ल शीरीन है
बुधवार, अगस्त 05, 2009
आज फ़िर गुज़री जवानी याद आई
आज फ़िर गुज़री जवानी याद आई
फ़िर मुहब्बत की, जिगर पर चोट खाई
फ़िर हवाओं को चुनौती दे रही है
फ़िर दिलोंमें प्यार की लौ टिमटिमाई
इश्कमें दिल हारने पर रो रहे हो
जब कफन बाँधें खडी सारी खुदाई
बारहा दिलने किया आगा़ह हमको
हम युँहीं देते रहे दिल को दुहाई
काश, अपने दिल के अंदर झाँक लेते
बेसबब होती नहीं है बेवफाई
जाम, साकी, इश्क़ के देखो परे भी
तब समझ खय्यामकी आये रुबाई
यह कभी पसली हमारें जिस्म की थी
क्या गज़ब की चीज़ हव्वा है बनाई
क्या शिकायत खा़क होने की करें हम?
इश्क़ की यह आग हमने खुद लगाई
हर्फ़ तक आता नहीं अपना वजनसे
फलसफे की बात यह किसने चलाई?
फ़िर मुहब्बत की, जिगर पर चोट खाई
फ़िर हवाओं को चुनौती दे रही है
फ़िर दिलोंमें प्यार की लौ टिमटिमाई
इश्कमें दिल हारने पर रो रहे हो
जब कफन बाँधें खडी सारी खुदाई
बारहा दिलने किया आगा़ह हमको
हम युँहीं देते रहे दिल को दुहाई
काश, अपने दिल के अंदर झाँक लेते
बेसबब होती नहीं है बेवफाई
जाम, साकी, इश्क़ के देखो परे भी
तब समझ खय्यामकी आये रुबाई
यह कभी पसली हमारें जिस्म की थी
क्या गज़ब की चीज़ हव्वा है बनाई
क्या शिकायत खा़क होने की करें हम?
इश्क़ की यह आग हमने खुद लगाई
हर्फ़ तक आता नहीं अपना वजनसे
फलसफे की बात यह किसने चलाई?
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