ज़रा नज़रें झुकाकर बात करते, बात बन जाती
न था मुमकिन तो बस दीदार करते, बात बन जाती
रिवाज़ोरस्मेदुनिया के बहाने कब तलक दोगे ?
कभी दुनिया को भी नाराज़ करते, बात बन जाती
ज़माने की नज़र दिनरात है हमपर, चलो माना
कभी ख्व्वाबोंको ही गुलज़ार करते, बात बन जाती
घनेरे बादलोमें चाँद को कुछ और निखराते
चमकती आँख सुरमेदार करते, बात बन जाती
ज़रूरत क्या थी अपने हाथमें खंजर उठानेकी ?
नज़रसे मौत का सामान करते, बात बन जाती
हमेशा हुस्न के आगे झुके आशिक़ भला क्योंकर ?
उन्हेभी छेडते, बेहाल करते, बात बन जाती
कचहरी और कुतवाली के चक्कर क्यों लगाते हो ?
हमारी हमसे ही फरयाद करते, बात बन जाती
खुशी तो है के हमसे प्यार आख़िर कर लिया तुमने
जवानीमें अगर आगाज़ करते, बात बन जाती
बराये मेहरबानी ना मिलो तनहा रकीबोंसे
सरेमेहफ़िल हमें रुसवाह करते, बात बन जाती
गज़ल लंबीसी कह देना कहाँ इतना ज़रूरी था ?
'भँवर' दिलसे ज़रासी आह करते, बात बन जाती
मंगलवार, फ़रवरी 09, 2010
रविवार, जनवरी 31, 2010
बस्तियोंके दीप क्यों बुझने लगे हैं ?
बस्तियोंके दीप क्यों बुझने लगे हैं ?
रोशनीसे लोग क्या डरने लगे हैं ?
और कुछ जमहूरियत देगी, न देगी
ख्व्वाब के बाज़ार तो सजने लगे हैं
मंज़िलें अपनी जगह कायम हैं लेकिन
रास्तें मुडते हुए दिखने लगे हैं
रहनुमाओं ने कहाँ लाया हैं हमको ?
लोग उलटे पाँव क्यों चलने लगे हैं ?
गीत गाते थे बगावत के कभी जो
जानिबेदौलत जरा बढने लगे हैं
इन्किलाबी गीत अब गाता नहीं मैं
शेर कुछ कुछ अब मेरे बिकने लगे हैं
देख ली है पेशकदमी शायरोंकी
फिर मरीजेइश्कसे लगने लगे हैं
ऐ 'भँवर', चारों तरफ मेलें लगे हैं
फ़िक्र क्या इन्सान गर घटने लगे हैं ?
रोशनीसे लोग क्या डरने लगे हैं ?
और कुछ जमहूरियत देगी, न देगी
ख्व्वाब के बाज़ार तो सजने लगे हैं
मंज़िलें अपनी जगह कायम हैं लेकिन
रास्तें मुडते हुए दिखने लगे हैं
रहनुमाओं ने कहाँ लाया हैं हमको ?
लोग उलटे पाँव क्यों चलने लगे हैं ?
गीत गाते थे बगावत के कभी जो
जानिबेदौलत जरा बढने लगे हैं
इन्किलाबी गीत अब गाता नहीं मैं
शेर कुछ कुछ अब मेरे बिकने लगे हैं
देख ली है पेशकदमी शायरोंकी
फिर मरीजेइश्कसे लगने लगे हैं
ऐ 'भँवर', चारों तरफ मेलें लगे हैं
फ़िक्र क्या इन्सान गर घटने लगे हैं ?
मंगलवार, जनवरी 26, 2010
खबर थी कि अपनी अलग राह चुनते
खबर थी कि अपनी अलग राह चुनते
कदम दो कदम तो मगर साथ चलते
नज़र ना चुराओ, तुम्हारी निगाहें
बदल जातीं है इक पलक के झपकते
अभी दाग दामनपर आया नहीं है
चुनरिया रही सर सरकते सरकते
बडी सख्त है जान हम पापियोंकी
गुजरती है सदियाँ निकलते निकलते
तुम्हारे महल हो; हमारी हैं गलियाँ
मिलोगे न कैसे यहाँ से गुजरते ?
कभी तो नज़र आइनेसे हटाओ
जवानी न बीते निखरते, सँवरते
जहाँ सिर्फ़ पतझड की आहट है बाकी
सुना था कभी पंछियों को चहकते
सभीने 'भँवर'से किया है किनारा
हमीं रह गये साहिलों को तरसते
कदम दो कदम तो मगर साथ चलते
नज़र ना चुराओ, तुम्हारी निगाहें
बदल जातीं है इक पलक के झपकते
अभी दाग दामनपर आया नहीं है
चुनरिया रही सर सरकते सरकते
बडी सख्त है जान हम पापियोंकी
गुजरती है सदियाँ निकलते निकलते
तुम्हारे महल हो; हमारी हैं गलियाँ
मिलोगे न कैसे यहाँ से गुजरते ?
कभी तो नज़र आइनेसे हटाओ
जवानी न बीते निखरते, सँवरते
जहाँ सिर्फ़ पतझड की आहट है बाकी
सुना था कभी पंछियों को चहकते
सभीने 'भँवर'से किया है किनारा
हमीं रह गये साहिलों को तरसते
मंगलवार, जनवरी 19, 2010
राह चलते हमकदम मिलता नहीं
राह चलते हमकदम मिलता नहीं
चाहनेसे साज़ेदिल छिडता नहीं
राह जाती हो न चिडियाघर कहीं
दूर तक इक आदमी दिखता नहीं
मरघटोंसे है गया-गुज़रा शहर
धूम क्या, मातम यहाँ मचता नहीं
चश्मनम तो सूख जाती है मगर
क्या बला है खूनेदिल, थमता नहीं
एक मुद्दतसे नहीं कोई मिला
और खुद से अब तो जी भरता नहीं
खुदबखुद इक आह दिल से आ गयी
जानकर तो शेर मैं कहता नहीं
रोज़ हालेदिल नहीं कहतें, 'भँवर'
दश्तेसहरामें सुखन खिलता नहीं
यात्रा
मिट चुका हैं गाँव निकला था जिसे मैं छोडकर
और बसना था जहाँ, आबाद वह ना हो सका
दूर तक आगे दिखाई दे रही है बस डगर
रोकभी सकता नहीं मुडती हुई अपनी नज़र
लौटभी सकता नहीं अपनी प्रतिज्ञा तोडकर ||१||
दुख नहीं कि राहमें काटें अधिक हैं, फूल कम
दुख नही कि राहमें कोई नहीं है हमकदम
साथमें यादें सुहानी जब चली हैं झूमकर ||२||
पेड हैं निष्पर्ण सारें, छाँव देने से रहें
सूर्य तो बरसा किया, बादल बरसने से रहें
चाँद मेरा बादलोंमें छुप गया मुख मोडकर ||३||
प्यास का क्या, जन्मक्षणसे साथ है मृत्यू तलक
गात्र को आजन्म सहनी है क्षुधा की यह दहक
चित्त विचलित कर मुझे कहीं ले न जाए ओढकर ||४||
और बसना था जहाँ, आबाद वह ना हो सका
दूर तक आगे दिखाई दे रही है बस डगर
रोकभी सकता नहीं मुडती हुई अपनी नज़र
लौटभी सकता नहीं अपनी प्रतिज्ञा तोडकर ||१||
दुख नहीं कि राहमें काटें अधिक हैं, फूल कम
दुख नही कि राहमें कोई नहीं है हमकदम
साथमें यादें सुहानी जब चली हैं झूमकर ||२||
पेड हैं निष्पर्ण सारें, छाँव देने से रहें
सूर्य तो बरसा किया, बादल बरसने से रहें
चाँद मेरा बादलोंमें छुप गया मुख मोडकर ||३||
प्यास का क्या, जन्मक्षणसे साथ है मृत्यू तलक
गात्र को आजन्म सहनी है क्षुधा की यह दहक
चित्त विचलित कर मुझे कहीं ले न जाए ओढकर ||४||
मंगलवार, जनवरी 12, 2010
जवाँ आशिकोंके दिलोंसा शहर है
जवाँ आशिकोंके दिलोंसा नगर है
सुकूँ है कहीं तो कहीं पर गदर है
कहाँ जा रहा हूँ, कहाँ तक सफर है ?
कहीं पर है मंज़िल, कहीं रहगुजर है
यहाँ आ गया जो, न फिर लौट पाया
बडा बेरहम यह तिलिस्मी नगर है
किसी रोज साकी करेगा इनायत
अभी जाम खाली हमारी नज़र है
जिये जा रहें सब, पिये जा रहें सब
नशा मुफ्लिसीका चढा सर-ब-सर है
न जन्नत मिली ना मिली हूर कोई
करूँ क्या, अभी वाइज़ोंपर गुजर है
न झुककर कभी पाँव छूना हमारें
हमारी दुआ तो बडी बेअसर है
अभी मस्त है वह जुए की फ़तहमें
कुरुक्षेत्र की ओर अपनी नज़र है
लगे ना कभी लत शराबेसुखन की
नशा मैकशी का पहर, दो पहर है
खयालात उमदा, न कोई हुनर है
बडे बेतुके शेर कहता 'भँवर' है
सुकूँ है कहीं तो कहीं पर गदर है
कहाँ जा रहा हूँ, कहाँ तक सफर है ?
कहीं पर है मंज़िल, कहीं रहगुजर है
यहाँ आ गया जो, न फिर लौट पाया
बडा बेरहम यह तिलिस्मी नगर है
किसी रोज साकी करेगा इनायत
अभी जाम खाली हमारी नज़र है
जिये जा रहें सब, पिये जा रहें सब
नशा मुफ्लिसीका चढा सर-ब-सर है
न जन्नत मिली ना मिली हूर कोई
करूँ क्या, अभी वाइज़ोंपर गुजर है
न झुककर कभी पाँव छूना हमारें
हमारी दुआ तो बडी बेअसर है
अभी मस्त है वह जुए की फ़तहमें
कुरुक्षेत्र की ओर अपनी नज़र है
लगे ना कभी लत शराबेसुखन की
नशा मैकशी का पहर, दो पहर है
खयालात उमदा, न कोई हुनर है
बडे बेतुके शेर कहता 'भँवर' है
शुक्रवार, दिसंबर 25, 2009
ज़िंदगी के ख्वाब से मैं डर रहा हूँ
ज़िंदगी के ख्वाब से मैं डर रहा हूँ
मौत के आनेसे पहले मर रहा हूँ
मौत से डरता रहा हूँ रात-दिन मैं
इस तरह, ना जी रहा, ना मर रहा हूँ
कारवाँ चलता रहा है ज़िंदगी का
मैं ज़रा पीछे मगर अक्सर रहा हूँ
बंद दिल के द्वार जब से कर चुकी वह
मैं तभी से आज तक बेघर रहा हूँ
वह गयी तो दिल धडकना छोड बैठा
सिर्फ़ इक बेजानसा पैकर रहा हूँ
अब तो खुशबूभी नहीं उनके ज़हनमें
इत्र दामन का कभी बनकर रहा हूँ
बढ रहा था, आ गया ठहराव कैसा ?
आप अपनी राहमें पत्थर रहा हूँ
हँस रहें हो देखकर खाली सुराही
यह न भूलो मैं कभी साग़र रहा हूँ
और तो कुछ बन न पाया ज़िंदगीमें
फ़क्र हैं मुझको, 'भँवर', शायर रहा हूँ
मौत के आनेसे पहले मर रहा हूँ
मौत से डरता रहा हूँ रात-दिन मैं
इस तरह, ना जी रहा, ना मर रहा हूँ
कारवाँ चलता रहा है ज़िंदगी का
मैं ज़रा पीछे मगर अक्सर रहा हूँ
बंद दिल के द्वार जब से कर चुकी वह
मैं तभी से आज तक बेघर रहा हूँ
वह गयी तो दिल धडकना छोड बैठा
सिर्फ़ इक बेजानसा पैकर रहा हूँ
अब तो खुशबूभी नहीं उनके ज़हनमें
इत्र दामन का कभी बनकर रहा हूँ
बढ रहा था, आ गया ठहराव कैसा ?
आप अपनी राहमें पत्थर रहा हूँ
हँस रहें हो देखकर खाली सुराही
यह न भूलो मैं कभी साग़र रहा हूँ
और तो कुछ बन न पाया ज़िंदगीमें
फ़क्र हैं मुझको, 'भँवर', शायर रहा हूँ
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