बुधवार, अगस्त 10, 2011

बेवफा निकले लगे जो यारसे, हम क्या करें

बेवफा निकले लगे जो यारसे, हम क्या करें 

चाक दामन की शिकायत खारसे हम क्या करें



नाम उनके कर दिया था दिल हमेशा के लिये


वह रहे कुछ दिन किरायेदारसे, हम क्या करें



तंगदिल ऐसे नहीं हम, है अभी काफी जगह


जख़्म दो दिल खोलकर, दो-चारसे हम क्या करें



लाख की कोशिश मगर बेकार, वह माने नहीं


इल्तिजासे, प्यारसे, तकरारसे, हम क्या करें



इश्क है वह मर्ज़ जो नजदीकियोंसे फैलता


कानमें कहने की बातें तारसे हम क्या करें



बात जज़्बों की नहीं, हर चीज का इक वक़्त है


जब बहारें ना रहें, गुलज़ारसे हम क्या करें



सूखकर काटा हुए हम और वह है बेखबर


दिल लगाया नासमझ दिलदारसे, हम क्या करें



फोड देंगे आज आँखें या जला देंगे नकाब


जी अगर भरता न हो दीदारसे, हम क्या करें



दूसरे गुलशनमें झाँकें तो हमें ना टोकना


आपको फुरसत नहीं सिंगारसे, हम क्या करें



पूछते हो आइना क्यों तर्क हमने कर दिया


और छुपने वक़्त के यलगारसे हम क्या करें



हमने दिल की आग शेरोंमें उतारी है, 'भँवर'


लग रहे अल्फ़ाज़ गर अंगारसे, हम क्या करें

शनिवार, जुलाई 30, 2011

आज मेहफिलमें नहीं नाम-ओ-निशाँ परवाने का

आज मेहफिलमें नहीं नाम-ओ-निशाँ परवाने का

यह न हो आलम कहीं खुद शम्म्‍अ‌ के जल जाने का



हुस्न को भगवानने क्या खूब दे रख्खी जुबाँ


अर्ज भी करते हैं तो अंदाज़ है फरमाने का



और कितनी देर उठ-उठकर कयामत ढायेंगी ?


कब हुनर सीखेगी पलकें मूँदने-शरमाने का ?



हर नये दिन का अगर आग़ाज़ हो दीदारसे


ग़म किसे महसूस होगा चाँद के ढल जाने का ?



हाँ, हमें भी वक्त-ए-पीरी याद आना है खुदा


आज तो दिलपर है हावी संग इक बुतखानेका



दैर की इस भीडमें दुखसुखकी बातें क्या करें ?


देव, फुरसतमें किसी दिन रुख करो मैखाने का



दीन, दुनिया, दिल के मसले आप क्या कम थे, 'भँवर'


ज़िंदगीभर आदमी मोहताज क्यों है दाने का ?

शुक्रवार, जुलाई 22, 2011

मौत से पहलेही मुँहपर ओढ ली लोगोंने चादर

मौत से पहलेही मुँहपर ओढ ली लोगोंने चादर 

शुक्रिया तेरा, ज़माने, जी रही हूँ लाश होकर 



हो अगर बसमें, हमें रख दें तिजोरीमें छुपाकर 


रूह का वह खून कर दें, जिस्म परदेमें लिपटकर 



"बोल, तेरी क्या रज़ा है," यह नहीं पूछा किसीने 


हर कोई हाफ़िज़ बना है, बाप, भाई, दोस्त, शौहर 



ज़लज़ला या बाढ या सूखा, वजह सबकी यही है 


कह रहें ज़ाहिद सभी, अच्छे नहीं हव्वा के तेवर 



खूबसूरत है, सुनहरा है, मगर फिरभी कफ़स है 


ले मुझे आये हो जिसमें आप डोलीमें बिठाकर

सोमवार, जुलाई 04, 2011

लब्ज़ों के पैंतरोंसे आगे बढा न कोई

लब्ज़ों के पैंतरोंसे आगे बढा न कोई

अक्स-ए-खयाल-ए-शायर गर-चे दिखा न कोई



मुझको मिली न होगी ऐसी सजा न कोई


मेरे गुनाह क्या हैं, समझा सका न कोई



बदनाम मेहफिलोंने दामन छुडा लिया है


बज़्म-ए-शरीफ का भी देता पता न कोई



कितने अजीब हैं यह दुनिया के रास्ते भी


गुजरे हैं सब यहाँसे लेकीन बसा न कोई



चौपाल भी वहीं है, बाज़ार भी वहीं है


साहिब, खरी सुनाने कबिरा खडा न कोई



किस्सा-ए-ज़िंदगानी अक्सर रहे अधूरा


होता है खत्म कैसे यह जानता न कोई

मंगलवार, जून 14, 2011

कहीं सायें सलाखोंके, कहीं दीवार होती है

कहीं सायें सलाखोंके, कहीं दीवार होती है

मगर दिलपर जो पाबंदी लगे, बेकार होती है


निहत्ता मैं, वह लड़ने के लिये तैयार होती है

भँवे खंजर, नज़र तीखी, कमर तलवार होती है


निगाह-ए-नाज़, माना, दिल-जिगर के पार होती है 

यह ज़ख्मे-ए-इश्क है, इसकी कभी तकरार होती है ?


इनायत और तेवर बादलों के हुस्न जैसे हैं

गरजते हैं हज़ारों बार तब बौछार होती है


लगा हो दाँव पर सब कुछ तुम्हारा इस मुहब्बतमें

मगर उनकी नज़रमें दो घडी की रार होती है


हज़ारों सालसे दस्तूर आँखों का रहा है यह

नज़र पहले चुराई जाती है, फिर चार होती है


जुनूँ की बात है, यह काम आँखों का नहीं होता

नज़रमें क़ैस की लैला बड़ी गुलनार होती है


मुहब्बत की रवानी कब ज़माना रोक पाया है ?

दिलों की नाव या तो डूबती या पार होती है


लकीरें हाथ की बसमें नहीं होती कभी अपने

खिचीं जिसने उसीके हाथ यह पतवार होती है


'भँवर' ऐसा न समझो नाचनेवाले सभी खुश हैं  

के कठपुतली इशारा देखकर लाचार होती है

शनिवार, जून 11, 2011

चाहा था जो कुछ वह पाया लेकिन इसका रोना है

चाहा था जो कुछ वह पाया लेकिन इसका रोना है 

हर ख़्वाहिश का पूरा होना सौ का पैदा होना है 



दो दिन के हैं सावन-भादो, फिर जाड़ों का
है मौसम 

बंजर होने को है खेती, बो लो जो भी बोना है 



अपने दिल को अपना कहने की आदत कब छूटेगी ?


मोहर जिसपर ना हो उनकी ऐसा कोई कोना है ? 



अपनों-गैरों के आगे मैं कब तक दामन फैलाऊँ ? 


कतरा कतरा अपनी खुशियाँ खुद मुझको संजोना है 



अफसोस-ओ-मजबूरीने फिर तेरे दर पर लाया है 


रहमत की बारिश कर दे तू, मैला दामन धोना है

मंगलवार, मई 31, 2011

शायर को तर्के-साग़र की याद आई

शायर को तर्के-साग़र की याद आई

फिर ग़ालिब की और जिगर की याद आई


दिलको तेरी यादों ने ऐसे घेरा

जैसे शीशे को पत्थर की याद आई



खुशबू मिट्टी की लेकर आई बरसात

बिरहामें तेरे इत्तर की याद आई



रोना आया जब मुझको टूटे दिलपर

भूखों के हाल-ए-बदतर की याद आई



भूलभुलैयामें दुनिया की जब खोया

तब जाकर मुझको रहबर की याद आई



शम्म्‌-ए-मेहफिल रोशन है मेरे आगे

क्यों मुझको बुझती लौ घर की याद आई ?