शुक्रवार, दिसंबर 23, 2011

माँग कर लायी नहीं जाती

माँग कर लायी नहीं जाती
सादगी सीखी नहीं जाती

जो समझते हैं, समझते हैं
बात समझायी नहीं जाती

उस बहाने तो चले आते
काश, बीमारी नहीं जाती

उसने दिल पैरों तले रोंधा
फिर भी पाबोसी१ नहीं जाती

चोट खाने फिर चला आया
क्या करूँ, यारी नहीं जाती

दो घडी क्या मिल गयी आँखें
अब ये रुसवाई नहीं जाती

दिल ये कहता है यकीं कर ले
बदगुमानी२ भी नहीं जाती

अंगबीं३ क्या चीज है, मै४ भी
लबतलब५ से पी नहीं जाती

आदमी के दफ़्न होने तक
राहपैमाई६ नहीं जाती


१) पाबोसी: पायाचे चुंबन घेणे, पूजणे
२) बदगुमानी: गैरसमज
३) अंगबीं: मध
४) मै: मद्य
५) लब: ओठ       तलब: याचना, मागणी
६) राहपैमाई: यात्रा, सफर

शनिवार, दिसंबर 10, 2011

शायर-ए-नाकाम हैं, पर है तबीयत शायराना

एक हज़लनुमा रचना:

शायर-ए-नाकाम हैं, पर है तबीयत शायराना
माँगते फिरते हैं हम सबसे नसीहत शायराना

हमवज़न अल्फ़ाज़ का हमको नहीं है इल्म बिल्कुल
और बेहरों से हमारी है बगावत शायराना

हाँ, कवाफ़ी लडखडाये; हाँ, रदाफ़ी निभ न पायीं
क्या हुआ हमने अगर ली कुछ रियायत शायराना?

शेर के ऐवज में कर ली हो न तुकबंदी ज़रासी
पर सुखनवर के इरादे थे निहायत शायराना

दोस्त हम को देखकर आँखें चुराते हैं, चुराएँ
कब तलक टालेंगे? हम भी है कयामत शायराना

देखकर तुमको, 'भँवर', उस्तादजी कहने लगे है
"फिर चली आयी हमारे घर मुसीबत शायराना"

गुरुवार, दिसंबर 01, 2011

हमको न देखो यूँ निगाह-ए-नाज़ से

हमको न देखो यूँ निगाह-ए-नाज़ से
उम्मीद सुर की क्या शिकस्ता साज़ से?

दिल संगमरमर का नहीं तो क्या हुआ?
हैं दफ़्न यादें कम किसी मुमताज़ से?

सैयाद जब से हुस्न में आया नज़र
डरते हैं हम जज़बात के परवाज़ से

शायद हमारी याद आयी हो उन्हें
दुष्मन हमारें लग रहें नासाज़ से

बनकर फ़साना बात फैली है, 'भँवर'
उम्मीद ऐसी तो न थी हमराज़ से

मंगलवार, नवंबर 29, 2011

आसमाँ को इस ज़मीं से क्या पता क्या जुस्तजू है
गर कभी मिलना नहीं तो क्यों अज़ल से रू-बरू है?


आप झुकने से रहें, हम से उठा जाता नहीं है
रहगुज़र की धूल को फिर भी फलक की आरज़ू है


आजकल मौजों से उनकी छेडखानी बढ रही है
साहिलों के भी दिलों में डूबने की जुस्तजू है


बीच के इन फासलों को काटना मुष्किल नहीं है
वस्ल की राहों में रहबर यह मेरा दाग-ए-लहू है


शक्ल-सूरत हैं, 'भँवर', अशाअर के, पर फर्क यह है
शेर तो सबके लिये हैं, यह किसी से गुफ्तगू है

शनिवार, अक्टूबर 22, 2011

कहाँ है वक़्त अब आराम का?

कहाँ है वक़्त अब आराम का?
मुहब्बत काम सुबह-ओ-शाम का

तुम्हारे सामने किस काम का?
नशा फीका लगे इस जाम का

बुलाया अहल-ए-दिल को बज़्ममें
इरादा हो न कत्ल-ए-आम का

न जाने कब झुकी नज़रें उठें
न देखो रासता पैग़ाम का

लबों पर माशुका कब तक, 'भँवर'?
कभी तो नाम ले लो राम का

फूल गालोंपर सजाये रंजमें

फूल गालोंपर सजाये रंजमें
अश्क वह शबनम बताये रंजमें

हो सके तो बूझ उसके दर्दको
दूसरोंको जो हसाये रंजमें

जानकर अंजान बनते हैं सभी
लोग सब अपने-पराये रंजमें

घायलों को मुफ्तमें मिल जाती है
क्यों नमक बैठे-बिठाये रंजमें?

और क्या भगवानसे माँगू 'भँवर'?
आ गया वह बिनबुलाये रंजमें

गुरुवार, सितंबर 15, 2011

दफ़न कविताएँ

बहुत सी आधी-अधुरी कविताएँ दफ़न हैं                 
मेरी कापी के वीरान पन्नोंमें.

वे कविताएँ जो मूलत: अक्षम थी
पूर्णत्व तक पहुँचनेमें;
जिनका जीव था केवल
कुछ शब्दों का, चंद पंक्तियों का.

वे कविताएँ जो स्वयं नहीं उभरी
मन की गहराईयोंमें छिपे
बीते, अधभूले अनुभवों से;
जिनमें कुछ ना था
सिवा कारीगरी के.

वे कविताएँ जिनमें
ना मेरा प्रतिबिंब था,
ना समाज का,
ना हमारे सनातन असमंजस का.

वे कविताएँ जो परे थी
मेरी भाषा की मर्यादाओं से;
जिनके गर्भ का ओज
मेरी क्षीण प्रतिभा सह ना सकी.

उनकी मृत्यु का मुझे दुख नहीं.

मैं सोग मनाता हूँ उनका
जो समय से आगे चलकर,
सभ्यता के मान्य संकेतों को तोडकर
खोजना चाहती थी नये मार्ग
सत्य की ओर जानेवाले.

मैंने अपनेही हाथों से
उनकी भ्रूणहत्या कर दी.
हर कोई सॉक्रॅटिस नहीं हो सकता...