शनिवार, जुलाई 07, 2012

किसी की शानमें दीवान लिखना चाहता हूँ

किसी की शानमें दीवान लिखना चाहता हूँ
मैं अदना शेरमें तारें पिरोना चाहता हूँ

तेरे आँचलमें छुपने का बहाना चाहता हूँ
के सचमें दूरियाँ सारी मिटाना चाहता हूँ

जुनूनेइश्क़ की हद आजमाना चाहता हूँ
किसी पत्थर के सीनेमें ठिकाना चाहता हूँ

सुना है लज़्ज़तेज़ख़्मेजिगर सबसे जुदा है
मुहब्बतमें ज़रासी चोट खाना चाहता हूँ

कलम गुस्ताख होने की इजाज़त चाहता है
तेरी तसवीर बेपर्दा बनाना चाहता हूँ

शरारत किस तरह करतें हैं सिखलाओ मुझे भी
किसी रूठी हसीना को मनाना चाहता हूँ

बुधवार, मई 02, 2012

बादलों से हो ढके उन माहताबों से हमें क्या

बादलों से हो ढके उन माहताबों से हमें क्या
जो कभी सर से न सरके उन हिजाबों से हमें क्या

जानते हैं, बेवफा हैं शोख, मस्ताना निगाहें
तश्नगी से हैं मरासिम, डर सराबों से हमें क्या

सच न हो तो ग़म नहीं है, यह नहीं उम्मीद उनसे
चंद लमहों का सुकूँ दें, और ख़्वाबों से हमें क्या

डर लगे चिंगारियों से, जल न जाए आशियाना
अपनी फुलवारी रहे, बस, इन्किलाबों से हमें क्या

हम 'भँवर' हैं, ढूँढ लेंगें अपने मतलब के चमन को
खिलने से जो तर्क कर लें उन गुलाबों से हमें क्या

बुधवार, मार्च 21, 2012

ख़्व्वाब, चैन, नींदें, सब कुछ मसल गए

ख़्व्वाब, चैन, नींदें, सब कुछ मसल गए
आरिज़ों से होकर आँसू निकल गए

आप को समाँ का जब तक पता चला
थक गयी बहारें, मौसम बदल गए

दास्ताँ सुनायी तो हाल यह हुआ
सच गले न उतरा, पर झूठ चल गए

आँधियों ने पूछा होगा मेरा पता
देख, नाखुदाके तेवर बदल गए

क्या तुम्हे ज़रूरत थी पाँव की, 'भँवर' ?
आ सके न चलकर, काँधों के बल गए

बुधवार, मार्च 07, 2012

वस्ल का हर ख़्वाब बर आता नहीं

वस्ल का हर ख़्वाब बर आता नहीं
लौट कर गर मुंतज़र आता नहीं

रूठने में आप माहिर हैं मगर
मान जाने का हुनर आता नहीं

ज़ुल्फ़ के साये में दम ले लूँ ज़रा
राह में आगे शजर आता नहीं

सोचता हूँ दिल लगा लूँ आपसे
और तो कोई नज़र आता नहीं

कम से कम मुस्कान ही दे दो हमें
मुफ़्त में लाल-ओ-गुहर आता नहीं

पंखड़ी से होंट, उस पर फिर शहद
फूल पर यूँ ही 'भँवर' आता नहीं 

गुरुवार, मार्च 01, 2012

ज़िंदगी का रुख बदल जाता

ज़िंदगी का रुख बदल जाता
या सुकून-ए-मर्ग मिल जाता

मुस्कराता, मैं उजल जाता
ग़म का सूरज, काश, ढल जाता

ज़िद खुशी की मैंने कब की थी?
बस, खुशी का ख़्व्वाब चल जाता

यह ज़ियादा तो न थी ख़्वाहिश
एक दिन तो दिल बहल जाता

रोते रोते ज़िंदगी गुज़री
हँसते हँसते दम निकल जाता

रविवार, फ़रवरी 19, 2012

कौन कहता है मुहब्बत का जनाज़ा निकला

कौन कहता है मुहब्बत का जनाज़ा निकला
बात इतनी सी है, अपना भी पराया निकला

उम्र-ए-रफ़्ता को भुलाऊँ तो भुलाऊँ कैसे
बज़्म-ए-तनहाई में हर दम वह ज़माना निकला

खत लिखे लाख मगर लौट के आए सारे
जो किसीने न पढा ऐसा रिसाला निकला

आदमी कौन यहाँ, देव किसे कहते हैं
जिस को देखा वही पत्थर से तराशा निकला

चाल हम ऐसी चले, मात हमारी तय थी
जिस पर हमला किया वह सिर्फ पयादा निकला

थि खुमारी-ए-मुहब्बत तो लगा दिल गुलशन
होश आया तो वही बाग ख़राबा निकला

आज कल लोग, 'भँवर', भक्त हुए जाते हैं
के सर-ए-कू-ए-ख़राबात शिवाला निकला

गुरुवार, फ़रवरी 02, 2012

कैसे छलकाते हैं पैमाना सिखा

कैसे छलकाते हैं पैमाना सिखा
रिंद को तहज़ीब-ए-मैखाना सिखा

मस्त होना आप ही आ जाता है
मस्त होकर होश में आना सिखा

चाहता हूँ बेझिझक कुछ दिन जिऊँ
किस तरह बनते हैं दीवाना सिखा

हँसते हँसते खूब काटा है गला
मुझ को यह अंदाज़-ए-याराना सिखा

जाम सब को एकसा मिलता नहीं
घूँट कडवे हँस के पी जाना सिखा