शुक्रवार, सितंबर 24, 2010

फर्ज़

कितनी आसानीसे जाँ से दिल जुदा किया

आज हमने हँसके बेटी को बिदा किया



जब तलक वह थी यहाँ, घर दैरसा लगा

वह गई, पाकीज़गीने अल्विदा किया



देवता की देन थी, फिरभी न रख सके

फर्ज़ हमने बाप होने का अदा किया



ऐ नमी, तू आँखमें बेवक़्त आ गई

अपने घर वह जा रही थी, ग़मज़दा किया



जा; 'भँवर' से दूर इक साहिल तुझे मिले

अब किसी अपने को तूने नाखुदा किया...


गुरुवार, सितंबर 09, 2010

माना इनायतोंके काबिल तो हम नहीं

माना इनायतोंके काबिल तो हम नहीं

कैसी यह बेरुखी के ज़ुल्मोसितम नहीं ?



मुखडा हथेलियोंमें तुमने छुपा लिया

हाँ, ऊँगलियाँ हैं फैली, यह भी तो कम नहीं



मंज़िल मिले तो कैसे मुझ नामुराद को?

या रहगुजर नहीं या फिर हमकदम नहीं



आदत हुई है इतनी दुख-दर्द की मुझे

कैसे बिताऊँ उसको जो शामेग़म नहीं ?



ठहरो, कहार, थोडा सज लूँ, सँवार लूँ

दुनिया कहे जनाज़ा डोली से कम नहीं

शनिवार, जुलाई 31, 2010

हम मैकदे से हर दम प्यासे निकल गये

हम मैकदे से हर दम प्यासे निकल गये

साकी की लाज रखने झूमे, फिसल गये



उजली न एक पल भी दिल की उदासियाँ


रुखसार के उजाले नाकाम ढल गये



अब क्या बताएँ उनको क्यों आँख नम नहीं


थोडे छुपाएँ आँसू , थोडे निगल गये



नज़रें झुकी हुई हैं, तेवर भी नर्म हैं


आँखें दिखानेवाले कैसे बदल गये



ठंडी भरो न आहें, साँसों में आँच हो


कितने ही बर्फ के बुत छूते पिघल गये



आये तो थे मिटाने वह रौनक-ए-चमन


कुछ फूल खिल रहें थे, सो भी मसल गये



एहसानमंद हैं हम संग-ओ-रकीब के


घायल हुए तभी तो कहकर गज़ल गये...

रविवार, जुलाई 18, 2010

हाल-ए-दिल जब जब ज़ुबाँ पर आ गया

हाल-ए-दिल जब जब ज़ुबाँ पर आ गया

बोज़ भारी नातवाँ पर आ गया


बस गया है, हो, न हो उसकी रज़ा

खुल्द से आदम जहाँपर आ गया


इश्क़ परदे को हुआ है हुस्न से

वक़्त कैसा पासबाँ पर आ गया



चाँदनीसी वह ज़हन पर छा गयी

नूर जैसे कहकशाँ पर आ गया



आँख गीली आतिश-ए-दिल कह गयी

लाख रोका था धुआँ, पर आ गया



ना कली है, ना बहारों का समाँ

क्यों, 'भँवर', तू गुलसिताँ पर आ गया ?

मंगलवार, जुलाई 13, 2010

उजाले आप की आँखोंके कुछ मिलते निशानीमें

उजाले आप की आँखोंके गर मिलते निशानीमें

जला लेते दिये यादों के हम ग़म की सियाहीमें



कभी "उफ" तक, सनम, करते नहीं हम बेकरारीमें

रियायत आप गर करते कभी वादाखिलाफ़ीमें



अभी तक डर रहा हूँ, नींद फिर आए न आँखोंमें

किसीसे आशना हूँ, ख्वाब देखा था जवानीमें



कहा जब संग उनको, पत्थरोंने भी शिकायत की

"कभी पत्थर हुए शामिल किसी की जगहसाईमें ?"



 ग़मे-हस्ती ग़मे-नाकाम हसरत से जुदा क्या है ?

तमन्नाएँ सभी किसकी हुई पूरी खुदाईमें ?



ज़मानेभर की रुसवाई चली आई है मिलनेको

'भँवर', रह जाए ना कोई कसर मेहमाँनवाज़ीमें

शुक्रवार, जुलाई 02, 2010

प्यारी है हमको किस लिए फुरकत न पूछो

प्यारी है हमको किस लिए फुरकत न पूछो 

बादेजुदाई वस्ल की लज़्ज़त न पूछो 



पत्थर पिघलनेमें गुज़र जाती हैं सदियाँ 


है बुतपरस्ती किस कदर आफत न पूछो 



कुछ हुस्न उनका, कुछ जवानी का तकाज़ा 


कैसे लगी दीदार की यह लत न पूछो 



आशिक़मिजाज़ीने किया है नाम रोशन 


कैसी शरीफोंसे मिली इज़्ज़त न पूछो 



ठुमरी, गज़ल, मुजरें हज़ारों सुन चुके हैं


बेसाज़ लोरी की मगर रंगत न पूछो

सोमवार, जून 21, 2010

नसीहत ख़िज्र की सुनती है दुनिया

नसीहत ख़िज्र की सुनती है दुनिया

मगर कुछ कान से बहरी है दुनिया



सभी ख्वाबों-खयालोंमें मगन है


न जाने किस तरह चलती है दुनिया



सुना करते थे बदलेगा ज़माना


(किताबोंमें यही लिखती है दुनिया)



गले से ज़िंदगी को मत लगाना


तुम्हें अय्याश कह सकती है दुनिया



इन्ही से तो पनपती है बगावत


सनम, ख्वाबोंसे ही डरती है दुनिया



हमें क्यों फिक्ऱ हो उस बेवफाकी ?


सँभालेगा वही जिसकी है दुनिया



'भँवर' तेरे लिए ही ठीक होगी


शरीफों पर कहाँ जचती है दुनिया ?