सोमवार, सितंबर 12, 2011

दिल-ए-नाशाद को बेताब-ओ-बेकरार हुए

 दिल-ए-नाशाद को बेताब-ओ-बेकरार हुए

 हो गया एक ज़माना विसाल-ए-यार हुए



गुंचा-ए-दिल कि तरफ देख, सूखने न लगे

एक अरसा हुआ आँखों को अश्कबार हुए



वह कहीं झीनत-ए-दीवार कर न ले सर को

कू-ए-जानामें थे आशिक कईं शिकार हुए



दोस्त कुछ खास मिले हैं उन्हें ज़रूर वहाँ

लौट आये न कभी जो नदी के पार हुए



वह न पुरसिश को चले आए बेनकाब, 'भँवर'

अभी दो दिन न हुए तीर आरपार हुए

सोमवार, सितंबर 05, 2011

हर हर्फ़ के वज़न पर होगा बवाल कब तक

हर हर्फ़ के वज़न पर होगा बवाल कब तक

अल्फ़ाज़-ए-शायरी को तरसे खयाल कब तक



ग़मसे निजात माँगें ऐसे नहीं सुखनवर


जो रूह-ए-शायरी है उसका मलाल कब तक



इक रूह ही नहीं है पहचान आदमी की


बहलाये जिस्म-ओ-जाँ को ख्व्वाब-ए-विसाल कब तक



मिटने लगी हैं आँखें, फिरभी है बंद मुठ्ठी


दिलसे लगा रखोगे यह जान-ओ-माल कब तक



अब और इम्तिहाँमें बैठा न जाये मुझसे


यह ज़िंदगी करेगी तेढे सवाल कब तक  

रविवार, अगस्त 28, 2011

उजाले ढूँढनेसे कब मिले हैं ?

उजाले ढूँढनेसे कब मिले हैं ?

उफ़क़पर हैं, कभी पैरोंतले हैं


लिखी नाकामियाँ तकदीरमें या


कहीं कमज़ोर अपने हौसले हैं



सुबह के ख्व्वाब हमको ना दिखाओ


हमारे दिन सियाहीमें घुले हैं



सियासी हाथपर ना खून ढूँढो


सुना है दूध के वह सब धुले हैं



यह माना वस्लमें कुछ मुष्किले हैं


ज़मींसे हम, फलकसे वह चले हैं



'भँवर' दरजी बडा नादान निकला


है दामन चाक लेकिन लब सिले हैं

बुधवार, अगस्त 10, 2011

बेवफा निकले लगे जो यारसे, हम क्या करें

बेवफा निकले लगे जो यारसे, हम क्या करें 

चाक दामन की शिकायत खारसे हम क्या करें



नाम उनके कर दिया था दिल हमेशा के लिये


वह रहे कुछ दिन किरायेदारसे, हम क्या करें



तंगदिल ऐसे नहीं हम, है अभी काफी जगह


जख़्म दो दिल खोलकर, दो-चारसे हम क्या करें



लाख की कोशिश मगर बेकार, वह माने नहीं


इल्तिजासे, प्यारसे, तकरारसे, हम क्या करें



इश्क है वह मर्ज़ जो नजदीकियोंसे फैलता


कानमें कहने की बातें तारसे हम क्या करें



बात जज़्बों की नहीं, हर चीज का इक वक़्त है


जब बहारें ना रहें, गुलज़ारसे हम क्या करें



सूखकर काटा हुए हम और वह है बेखबर


दिल लगाया नासमझ दिलदारसे, हम क्या करें



फोड देंगे आज आँखें या जला देंगे नकाब


जी अगर भरता न हो दीदारसे, हम क्या करें



दूसरे गुलशनमें झाँकें तो हमें ना टोकना


आपको फुरसत नहीं सिंगारसे, हम क्या करें



पूछते हो आइना क्यों तर्क हमने कर दिया


और छुपने वक़्त के यलगारसे हम क्या करें



हमने दिल की आग शेरोंमें उतारी है, 'भँवर'


लग रहे अल्फ़ाज़ गर अंगारसे, हम क्या करें

शनिवार, जुलाई 30, 2011

आज मेहफिलमें नहीं नाम-ओ-निशाँ परवाने का

आज मेहफिलमें नहीं नाम-ओ-निशाँ परवाने का

यह न हो आलम कहीं खुद शम्म्‍अ‌ के जल जाने का



हुस्न को भगवानने क्या खूब दे रख्खी जुबाँ


अर्ज भी करते हैं तो अंदाज़ है फरमाने का



और कितनी देर उठ-उठकर कयामत ढायेंगी ?


कब हुनर सीखेगी पलकें मूँदने-शरमाने का ?



हर नये दिन का अगर आग़ाज़ हो दीदारसे


ग़म किसे महसूस होगा चाँद के ढल जाने का ?



हाँ, हमें भी वक्त-ए-पीरी याद आना है खुदा


आज तो दिलपर है हावी संग इक बुतखानेका



दैर की इस भीडमें दुखसुखकी बातें क्या करें ?


देव, फुरसतमें किसी दिन रुख करो मैखाने का



दीन, दुनिया, दिल के मसले आप क्या कम थे, 'भँवर'


ज़िंदगीभर आदमी मोहताज क्यों है दाने का ?

शुक्रवार, जुलाई 22, 2011

मौत से पहलेही मुँहपर ओढ ली लोगोंने चादर

मौत से पहलेही मुँहपर ओढ ली लोगोंने चादर 

शुक्रिया तेरा, ज़माने, जी रही हूँ लाश होकर 



हो अगर बसमें, हमें रख दें तिजोरीमें छुपाकर 


रूह का वह खून कर दें, जिस्म परदेमें लिपटकर 



"बोल, तेरी क्या रज़ा है," यह नहीं पूछा किसीने 


हर कोई हाफ़िज़ बना है, बाप, भाई, दोस्त, शौहर 



ज़लज़ला या बाढ या सूखा, वजह सबकी यही है 


कह रहें ज़ाहिद सभी, अच्छे नहीं हव्वा के तेवर 



खूबसूरत है, सुनहरा है, मगर फिरभी कफ़स है 


ले मुझे आये हो जिसमें आप डोलीमें बिठाकर

सोमवार, जुलाई 04, 2011

लब्ज़ों के पैंतरोंसे आगे बढा न कोई

लब्ज़ों के पैंतरोंसे आगे बढा न कोई

अक्स-ए-खयाल-ए-शायर गर-चे दिखा न कोई



मुझको मिली न होगी ऐसी सजा न कोई


मेरे गुनाह क्या हैं, समझा सका न कोई



बदनाम मेहफिलोंने दामन छुडा लिया है


बज़्म-ए-शरीफ का भी देता पता न कोई



कितने अजीब हैं यह दुनिया के रास्ते भी


गुजरे हैं सब यहाँसे लेकीन बसा न कोई



चौपाल भी वहीं है, बाज़ार भी वहीं है


साहिब, खरी सुनाने कबिरा खडा न कोई



किस्सा-ए-ज़िंदगानी अक्सर रहे अधूरा


होता है खत्म कैसे यह जानता न कोई