मंगलवार, फ़रवरी 09, 2010

ज़रा नज़रें झुकाकर बात करते, बात बन जाती

ज़रा नज़रें झुकाकर बात करते, बात बन जाती

न था मुमकिन तो बस दीदार करते, बात बन जाती


रिवाज़ोरस्मेदुनिया के बहाने कब तलक दोगे ?

कभी दुनिया को भी नाराज़ करते, बात बन जाती


ज़माने की नज़र दिनरात है हमपर, चलो माना

कभी ख्व्वाबोंको ही गुलज़ार करते, बात बन जाती


घनेरे बादलोमें चाँद को कुछ और निखराते

चमकती आँख सुरमेदार करते, बात बन जाती


ज़रूरत क्या थी अपने हाथमें खंजर उठानेकी ?

नज़रसे मौत का सामान करते, बात बन जाती


हमेशा हुस्न के आगे झुके आशिक़ भला क्योंकर ?

उन्हेभी छेडते, बेहाल करते, बात बन जाती


कचहरी और कुतवाली के चक्कर क्यों लगाते हो ?

हमारी हमसे ही फरयाद करते, बात बन जाती


खुशी तो है के हमसे प्यार आख़िर कर लिया तुमने

जवानीमें अगर आगाज़ करते, बात बन जाती


बराये मेहरबानी ना मिलो तनहा रकीबोंसे 

सरेमेहफ़िल हमें रुसवाह करते, बात बन जाती


गज़ल लंबीसी कह देना कहाँ इतना ज़रूरी था ?

'भँवर' दिलसे ज़रासी आह करते, बात बन जाती

1 टिप्पणी:

योगेश स्वप्न ने कहा…

खुशी तो है के हमसे प्यार आख़िर कर लिया तुमने

जवानीमें अगर आगाज़ करते, बात बन जाती


बराये मेहरबानी ना मिलो तनहा रकीबोंसे

सरेमेहफ़िल हमें रुसवाह करते, बात बन जाती

sabhi behatareen hain.