शुक्रवार, अक्तूबर 23, 2009

बढी बात जब बातही बातमें

बढी बात जब बातही बातमें
हसीं शाम ढलने लगी रातमें

न पर्दा उठाओ, कसम है तुम्हे
मिले ना जुनूँ और जज़्बातमें

तमन्ना जवाँ क्यों न होने लगे ?

झुकाये नज़र वह मुलाकातमें

कहीं फूल का बस बहाना न हो
कहीं दिल दिया हो न सौगातमें

समझ लो है आतिश मुहब्बतजनी
अगरचे लगे आग बरसातमें

अगर जीत लो तुम, मुझे है खुशी
तुम्हे क्या मिलेगा मेरी मातमें ?

'भँवर', ख्व्वाब गुलज़ार होने लगे
उन्हें बो लिया है खयालातमें

2 टिप्‍पणियां:

योगेश स्वप्न ने कहा…

BEHATAREEN RACHNA. BADHAAI.

MUFLIS ने कहा…

bahut achhaa prayaas hai
bhaav bahut prabhaavit karte haiN
badhaaee