बुधवार, मार्च 10, 2010

जब भी मिली, मिलकर गलें, बोली उदासी

जब भी मिली, मिलकर गलें, बोली उदासी

"बिछडे हुए दो दिल मिलें", बोली उदासी




अपने वफादारोंमें लिख लो नाम मेरा

क्यों हममें तुममें फासलें, बोली उदासी




अपने भी कुछ अरमान हैं, कुछ ख़्वाब रंगीं

अपनें भी घर फूले-फलें, बोली उदासी




कोई नहीं है हमसफर, साथी हमारा

खुशियों के लाखों काफ़िलें, बोली उदासी




कोई मुहब्बत के तराने भी सुनाए

कब तक ग़मों के वलवलें, बोली उदासी




कोई तो हँसकर थाम ले बाहें हमारी

हमको मिलें बस दिलजलें, बोली उदासी




कोई न हो साथी तुम्हारा, हम रहेंगे

हर शाम-ए-ग़म मिलकर चलें, बोली उदासी




आए हो तुम, खुशियोंने जब दामन छुडाया

खुदके नहीं यह फ़ैसलें, बोली उदासी




गहराइयाँ ग़म की, 'भँवर', हमसे न पूछो

कहिं कम पडे ना हौसलें, बोली उदासी

1 टिप्पणी:

योगेश स्वप्न ने कहा…

aaye ho to pas baitho muskurao
hum bhi samjhenge chalo "ho li" udaasi.

bahut sunder rachna lagi ye badhaai. rok na saka apne aap ko aise ho do line maine bhi jod di.