शनिवार, अक्तूबर 22, 2011

कहाँ है वक़्त अब आराम का?

कहाँ है वक़्त अब आराम का?
मुहब्बत काम सुबह-ओ-शाम का

तुम्हारे सामने किस काम का?
नशा फीका लगे इस जाम का

बुलाया अहल-ए-दिल को बज़्ममें
इरादा हो न कत्ल-ए-आम का

न जाने कब झुकी नज़रें उठें
न देखो रासता पैग़ाम का

लबों पर माशुका कब तक, 'भँवर'?
कभी तो नाम ले लो राम का

2 टिप्‍पणियां:

आशा जोगळेकर ने कहा…

मिलिंद आपकी गजलें बहुत प्यारी हैं । लिखते हुए थोडा ख्याल करें जैसे लबों पर लिखें लबोंपर नही ।

मिलिंद / Milind ने कहा…

धन्यवाद, आशाजी.