सोमवार, नवंबर 16, 2009

तुम न आये, न कासिदो-खत तक

तुम न आये, न कासिदो-खत तक
दिल तडपता रहा कयामत तक

ज़ुल्म चुपचाप क्यों सहें हमने ?
अब तो मुमकिन नहीं शिकायत तक

अज़लसे हुस्नका अलम दिलपर
कर चुके दिलजलें बगावत तक

ज़ुल्म का दौर है अभी जारी
बात पहुँची कहाँ इनायत तक ?

साथ देना, चलो, नहीं मुमकिन
आप करते नहीं हिमायत तक

फिर तुम्हारा खयाल आया है
फिर हमें ले चले न गुरबत तक

इश्कमें क्या नहीं, 'भँवर', छोडा
शर्म क्या, छोड दी शराफत तक

2 टिप्‍पणियां:

योगेश स्वप्न ने कहा…

behatareen/lajawaab.

योगेश ’अर्श’ ने कहा…

बहोत खूब...