मंगलवार, नवंबर 24, 2009

क्या हुआ गर आँख उसकी नम नहीं ?

क्या हुआ गर आँख उसकी नम नहीं ?

यह पुरानी याद का मौसम नहीं


दूर तक हो फूल नज़रेयारमें

क्या हुआ गर गुलशनोमें हम नहीं ?


उन लबों पर वस्ल की हो सुर्खियाँ

आशिकोंकी मौत का मातम नहीं


दर्द उतना दो जिसे मैं सह सकूँ

आदमी हूँ; देवता, बरहम नहीं


और तोहफ़ा क्या उसे मैं दूँ, 'भँवर' ?

यार का सहरा लिखा यह कम नहीं

4 टिप्‍पणियां:

योगेश स्वप्न ने कहा…

और तोहफ़ा क्या उसे मैं दूँ, 'भँवर' ?

यार का सहरा लिखा यह कम नहीं

bahut khoob. behatareen.

Devendra ने कहा…

दर्द उतना दो जिसे मैं सह सकूँ
आदमी हूँ; देवता, बरहम नहीं
--वाह क्या बात है।

क्रान्ति ने कहा…

दर्द उतना दो जिसे मैं सह सकूँ

आदमी हूँ; देवता, बरहम नहीं

सुबहान अल्ला! क्या बात कही है!

MUFLIS ने कहा…

huzoor !!
bahut achhee gzl kahee hai
ek-ek sher dil meiN utartaa hai
ehsaas ka saleeqe.mnd izhaar .

"muskraati-si gazal ye aapki,
ab kisi deewaan se bhi km nahee"