सोमवार, दिसंबर 14, 2009

पँखडी को चूमकर शबनम हवामें खो गयी

पँखडी को चूमकर शबनम हवामें खो गयी
लाजसे चटकी कली, खिलकर जवाँ फिर हो गयी


गेसुओं की छाँवमें या हिज्रमें रातें कटी
दूर दोनो सूरतोमें नींद तो कोसो गयी


फिक्र गर होती हमारी, रुक न जाती वह ज़रा ?
करवटें बदला किये हम, रात आयी सो गयी


आपसे तो नर्मदिल हैं आसमाँकी बदलियाँ
आग जब दिलमें लगी तो चार आँसूँ रो गयी


आसुओंसे गुलशनेदिल जब पड हैं सिंचना
तब पता हमको चला वह बीज कैसे बो गयी


क्या उन्हें एहसास हैं हम जी रहें हैं किस तरह ?
वह हमें लंबी उमर की बददुवा दे तो गयी

2 टिप्‍पणियां:

योगेश ’अर्श’ ने कहा…

आपसे तो नर्मदिल हैं आसमाँकी बदलियाँ
आग जब दिलमें लगी तो चार आँसूँ रो गयी


आसुओंसे गुलशनेदिल जब पड हैं सिंचना
तब पता हमको चला वह बीज कैसे बो गयी



वाह वाह! बहोत खूब..!!

शोभित जैन ने कहा…

आपसे तो नर्मदिल हैं आसमाँकी बदलियाँ
आग जब दिलमें लगी तो चार आँसूँ रो गयी..

dil jeet liya