शनिवार, दिसंबर 19, 2009

दिल टूटने का जैसे दस्तूर होगया है

दिल टूटने का जैसे दस्तूर हो गया है
बरबादियों का किस्सा मशहूर हो गया है


अब जाके साहिलों का मैं दर्द जान पाया
कोई करीब आकर फिर दूर हो गया है


कैसे निजात पाऊँ मैं दर्दोरंजोग़मसे ?
मेरा रकीब उनका सिंदूर हो गया है


कोई गवाह होता दिल टूटने का, या रब
इल्ज़ामेबेवफाई मंजूर हो गया है


जब कोई शै जलेगी, होगा तभी उजाला
शायद इसीलिये दिल मजबूर हो गया है

2 टिप्‍पणियां:

योगेश स्वप्न ने कहा…

कैसे निजात पाऊँ मैं दर्दोरंजोग़मसे ?
मेरा रकीब उनका सिंदूर हो गया है

wah, bahut badhia.

योगेश ’अर्श’ ने कहा…

अब जाके साहिलों का मैं दर्द जान पाया
कोई करीब आकर फिर दूर हो गया है

वाह! बहोत खूब... मजा आ गया...
मिल्या मस्त रे! संपूर्ण गज़लच सही आहे. पण सगळ्यात बेश्ट शेर हाच!