शनिवार, जुलाई 31, 2010

हम मैकदे से हर दम प्यासे निकल गये

हम मैकदे से हर दम प्यासे निकल गये

साकी की लाज रखने झूमे, फिसल गये



उजली न एक पल भी दिल की उदासियाँ


रुखसार के उजाले नाकाम ढल गये



अब क्या बताएँ उनको क्यों आँख नम नहीं


थोडे छुपाएँ आँसू , थोडे निगल गये



नज़रें झुकी हुई हैं, तेवर भी नर्म हैं


आँखें दिखानेवाले कैसे बदल गये



ठंडी भरो न आहें, साँसों में आँच हो


कितने ही बर्फ के बुत छूते पिघल गये



आये तो थे मिटाने वह रौनक-ए-चमन


कुछ फूल खिल रहें थे, सो भी मसल गये



एहसानमंद हैं हम संग-ओ-रकीब के


घायल हुए तभी तो कहकर गज़ल गये...

3 टिप्‍पणियां:

mai... ratnakar ने कहा…

wah jee! kya baat hai, behad achchha likha hai

नीरज गोस्वामी ने कहा…

अब क्या बताएँ उनको क्यों आँख नम नहीं

थोडे छुपाएँ आँसू , थोडे निगल गये

भाई वाह...क्या बात है बेहतरीन ग़ज़ल...आनंद आ गया...लिखते रहें...
नीरज

शांताराम खामकर ने कहा…

hum to apke kalam ke diwane ho gaye...