ज़िंदगी है जंग, लढना सीख लो
जी सकोगे गर्चे मरना सीख लो
ना रुका है, ना रुकेगा कारवाँ
साथ दो या धूल बनना सीख लो
बेटियों जैसी चली वह जाएँगी
हँसके साँसोंसे बिछडना सीख लो
लोग मिलकर फिर जुदा हो जाएँगे
प्यार तनहाई से करना सीख लो
मंज़िलें तो उम्रभर तरसाएँगी
राह तुम अपनी बदलना सीख लो
वाईज़ों का बीचमें क्या काम है?
खुद खुदा से बात करना सीख लो
सोमवार, मई 17, 2010
शनिवार, मई 08, 2010
होंट चाहें और साग़र हैं मिलें
होंट चाहें और साग़र हैं मिले
रूह प्यासी और पैकर हैं मिले
ना उछल, ऐ मौज, चंदा देखकर
आसमाँसे कब समंदर हैं मिले
मिन्नतें की, गिडगिडाए, तब मिले
खूब हमको आज़माकर हैं मिले
इश्कमें तोहफ़ें मयस्सर हो गये
नाज़, नखरें, और तेवर हैं मिले
आजकल खिलने से भी डरता है दिल
गुलशनोंमें भी बवंडर हैं मिले
फूल को पहचानना दुश्वार है
हर कदम, हर मोड पत्थर हैं मिले
धूलको फिर भी गुमाँ होता नहीं
धूलमें लाखों सिकंदर हैं मिले
दर्द के गहरे 'भँवर' में डूबकर
अब सुखन के चंद गौहर हैं मिले
रूह प्यासी और पैकर हैं मिले
ना उछल, ऐ मौज, चंदा देखकर
आसमाँसे कब समंदर हैं मिले
मिन्नतें की, गिडगिडाए, तब मिले
खूब हमको आज़माकर हैं मिले
इश्कमें तोहफ़ें मयस्सर हो गये
नाज़, नखरें, और तेवर हैं मिले
आजकल खिलने से भी डरता है दिल
गुलशनोंमें भी बवंडर हैं मिले
फूल को पहचानना दुश्वार है
हर कदम, हर मोड पत्थर हैं मिले
धूलको फिर भी गुमाँ होता नहीं
धूलमें लाखों सिकंदर हैं मिले
दर्द के गहरे 'भँवर' में डूबकर
अब सुखन के चंद गौहर हैं मिले
शुक्रवार, अप्रैल 23, 2010
किसी दिन कहीं मेल होगा यकीनन
किसी दिन कहीं मेल होगा यकीनन
मुहब्बत नहीं सिर्फ़ धोखा यकीनन
नयी सोच दीवारसे क्या रुकेगी
मिलेगा हवा को झरोखा यकीनन
सुकून-ए-जिगर अब तलक मिल न पाया
अभी चेहरे पर है गोषा यकीनन
बहारोंमें हम सर्द आहों के मारे
किसी संगदिल का है बोसा यकीनन
खुली नींद क्यों शेषशायी तुम्हारी ?
"कन्हैया!", पुकारे यशोदा यकीनन
रदाफ़ी पुरानी, तखय्युल पुराने
है अंदाज़ लेकिन अनोखा यकीनन
लब-ए-गुल हो शीरीं, खतरनाक भी हैं
'भँवर' को शहदमें डुबोया यकीनन
मुहब्बत नहीं सिर्फ़ धोखा यकीनन
नयी सोच दीवारसे क्या रुकेगी
मिलेगा हवा को झरोखा यकीनन
सुकून-ए-जिगर अब तलक मिल न पाया
अभी चेहरे पर है गोषा यकीनन
बहारोंमें हम सर्द आहों के मारे
किसी संगदिल का है बोसा यकीनन
खुली नींद क्यों शेषशायी तुम्हारी ?
"कन्हैया!", पुकारे यशोदा यकीनन
रदाफ़ी पुरानी, तखय्युल पुराने
है अंदाज़ लेकिन अनोखा यकीनन
लब-ए-गुल हो शीरीं, खतरनाक भी हैं
'भँवर' को शहदमें डुबोया यकीनन
बुधवार, अप्रैल 07, 2010
सुकून-ए-जिगर को शरारा न कर ले
सुकून-ए-जिगर को शरारा न कर ले
कहीं दिल मुहब्बत गवारा न कर ले
यह माना हिजाबों में रहते हो लेकिन
हरममें ही कोई नज़ारा न कर ले
न यूँ छेडकर आग दिलमें लगाओ
यह आँधी कहीं रुख तुम्हारा न कर ले
कई साल के बाद रूठे हैं फिरसे
कहीं इश्क़ हमसे दुबारा न कर ले
किसी दिन तो, बेशक, ख़तम खेल होगा
शब-ए-वस्ल क्यों ख़त्म सारा न कर ले
'भँवर', ख़्वाब-ए-मंज़िल जुबाँपर न लाना
कहीं राह मुडकर किनारा न कर ले
कहीं दिल मुहब्बत गवारा न कर ले
यह माना हिजाबों में रहते हो लेकिन
हरममें ही कोई नज़ारा न कर ले
न यूँ छेडकर आग दिलमें लगाओ
यह आँधी कहीं रुख तुम्हारा न कर ले
कई साल के बाद रूठे हैं फिरसे
कहीं इश्क़ हमसे दुबारा न कर ले
किसी दिन तो, बेशक, ख़तम खेल होगा
शब-ए-वस्ल क्यों ख़त्म सारा न कर ले
'भँवर', ख़्वाब-ए-मंज़िल जुबाँपर न लाना
कहीं राह मुडकर किनारा न कर ले
मंगलवार, अप्रैल 06, 2010
उनको देखा, दिल मचलकर रह गया
उनको देखा, दिल मचलकर रह गया
चोट खाई, बन के पत्थर रह गया
मिट गये कितने ही ज़ख्मों के निशाँ
ज़ख्म दिल का बनकर नश्तर रह गया
क्या मिला है मुझको आँखें खोलकर ?
हर नज़ारा ख्वाब बनकर रह गया
चार आँसू क्या बहाए हुस्नने
हौसला-ए-संग ढहकर रह गया
ऐ ग़मों, अब अश्क़ ना माँगा करो
बनकर सहरा वह समंदर रह गया
देख, शायद चाँदपर इन्साँ मिले
ढूँढने याँ कौनसा घर रह गया ?
ज़िंदगी गहरी नदी सी बीचमें
पार जिसके मेरा नैहर रह गया
चोट खाई, बन के पत्थर रह गया
मिट गये कितने ही ज़ख्मों के निशाँ
ज़ख्म दिल का बनकर नश्तर रह गया
क्या मिला है मुझको आँखें खोलकर ?
हर नज़ारा ख्वाब बनकर रह गया
चार आँसू क्या बहाए हुस्नने
हौसला-ए-संग ढहकर रह गया
ऐ ग़मों, अब अश्क़ ना माँगा करो
बनकर सहरा वह समंदर रह गया
देख, शायद चाँदपर इन्साँ मिले
ढूँढने याँ कौनसा घर रह गया ?
ज़िंदगी गहरी नदी सी बीचमें
पार जिसके मेरा नैहर रह गया
रविवार, मार्च 28, 2010
इस कदर नाकामियोंसे प्यार था
इस कदर नाकामियोंसे प्यार था
ज़िंदगी की दौडसे इन्क़ार था
है पुराना बाढ आने का चलन
मेरी गलती है की मैं मँज़धार था
भूक़ से बेहाल होकर मर गया
लोग कहते हैं कोई खुद्दार था
फूल तू, गुलशन गली तेरी मगर
लौटकर देखा, जिगरमें खार था
ग़म न कर जो तेरे ग़ममें मर गया
खुदकुशी थी, तू तो बस औज़ार था
करवटें बदली हैं तेरी याद में
ख़्व्वाबमें भी तेराही रुखसार था
यह न समझो बस ज़रासी थी झलक
पद्मिनी के वासते जोहार था
लाख टोका, बेशरम फिर आ गया
क्या करे, यमदूत भी लाचार था
ज़िंदगी की दौडसे इन्क़ार था
है पुराना बाढ आने का चलन
मेरी गलती है की मैं मँज़धार था
भूक़ से बेहाल होकर मर गया
लोग कहते हैं कोई खुद्दार था
फूल तू, गुलशन गली तेरी मगर
लौटकर देखा, जिगरमें खार था
ग़म न कर जो तेरे ग़ममें मर गया
खुदकुशी थी, तू तो बस औज़ार था
करवटें बदली हैं तेरी याद में
ख़्व्वाबमें भी तेराही रुखसार था
यह न समझो बस ज़रासी थी झलक
पद्मिनी के वासते जोहार था
लाख टोका, बेशरम फिर आ गया
क्या करे, यमदूत भी लाचार था
शुक्रवार, मार्च 19, 2010
इसे काट देना ही बेहतर रहेगा
इसे काट देना ही बेहतर रहेगा
यह रिश्तों का धागा उलझकर रहेगा
जवाँ हो गयी है मेरे दिल कि कष्टी
ग़मों का कहीं तो समंदर रहेगा
चली बदहवा, नींद शोलों की टूटी
घरोंदा हमारा झुलसकर रहेगा
सितारें जहाँ टूटकर गिर चुके हैं
उन्हीमें कहीं अपना रहबर रहेगा
बिगडता है अक्सर ज़रा बनते बनते
यह शायद हमारा मुकद्दर रहेगा
कभी जाम छलके, कभी अश्क छलके
जिसे मस्त जीना है, पीकर रहेगा
न सीनेमें तूफाँ दबाओ, 'भँवर', तुम
वह जीतेजी दिलको डुबोकर रहेगा
यह रिश्तों का धागा उलझकर रहेगा
जवाँ हो गयी है मेरे दिल कि कष्टी
ग़मों का कहीं तो समंदर रहेगा
चली बदहवा, नींद शोलों की टूटी
घरोंदा हमारा झुलसकर रहेगा
सितारें जहाँ टूटकर गिर चुके हैं
उन्हीमें कहीं अपना रहबर रहेगा
बिगडता है अक्सर ज़रा बनते बनते
यह शायद हमारा मुकद्दर रहेगा
कभी जाम छलके, कभी अश्क छलके
जिसे मस्त जीना है, पीकर रहेगा
न सीनेमें तूफाँ दबाओ, 'भँवर', तुम
वह जीतेजी दिलको डुबोकर रहेगा
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